Cashless Health Insurance in India

हेल्थ इंश्योंरेंस की बारिकियों को संमझे

हेल्थ इंश्योंरेंस की बारिकियों को संमझे ( Simplified Health Insurance)

आपकी सेहत का ख्याल रखने वाला Health Insurance हर साल बढ़े प्रीमियम की चोट आपको दे जाता है। कैसे निपटा जाए प्रीमियम के बढ़ते बोझ से ?

तेजी से बदला माहौल
हेल्थ इंश्योरेंस के हर साल बढ़ते प्रीमियम ने महंगाई की मार से बेहाल आम आदमी के लिए ऐसी मुश्किल पैदा कर दी है, जिसका हल निकालना उसके लिए पेचीदा हो चला है। पिछले तीन-चार साल में जहां औसतन प्रीमियम में 40-50 पर्सेंट की बढ़ोतरी हुई है वहीं कुछ पॉलिसियों में यह बढ़ोतरी 100 से 200 फीसदी तक हुई है। हालांकि प्रीमियम में इस बढ़ोतरी की वजह इंश्योरेंस कंपनियों द्वारा तेजी से बढ़ रही मेडिकल कॉस्ट, क्लेम रेशो में हुए घाटे, ऐज बैंड व ग्रुप इंश्योरेंस जैसे फैक्टर बताए जाते हैं।

कैसे निपटें इस समस्या से

पिछले कुछ वक्त से जितनी तेजी से और जिस तरह से हेल्थ कवर पर प्रीमियम बढ़े हैं, उन्हें समझना व जरूरत के समय अपने कवर को सही तरह से उपयोग में लाना कस्टमर्स के लिए सिरदर्द बनता जा रहा है। लेकिन इसके बिना काम भी नहीं चल सकता, क्योंकि किसी भी मेडिकल इमर्जेंसी में हेल्थ इंश्योंरेंस पॉलिसी इस महंगाई के जमाने में संजीवनी बूटी बन जाती है। प्रीमियम की बढ़ती रकम के बोझ से बचने के लिए आपको कुछ खास करना होगा। इरडा की गाइडलाइन और जागरुकता के बूते अपने हेल्थ कवर प्रीमियम को वक्त के साथ आप कम कर सकते हैं।

रिलायंस जनरल इंश्योरेंस के सीईओ राकेश जैन कहते हैं, ‘मेडिकल इन्फ्लेशन के कारण जो प्रीमियम में बढ़ोतरी हुई है उसे कम करने के लिए पहले बढ़ते प्रीमियम का कारण समझना होगा। जब मेडिकल सुविधाएं मुहैया करवाने वाली कंपनी की कॉस्ट मरीजों को उपलब्ध करवाए जाने वाले मेडिकल एडवांसमेंट व प्रॉसिजर के बढ़े खर्च के कारण बढ़ती है तो लोगों को उसे समझना होगा। जिसके पास पॉलिसी है वह इलाज करवाते वक्त अपने लिए सबसे बेहतर का चुनाव करता है। उसे पाबंदियां पसंद नहीं। ऐसे में कवर तो कम पड़ता ही है साथ ही प्रीमियम में बढ़ोतरी भी झेलनी पड़ती है। ऐसे में अगर आप ऑल इन्क्लूसिव पॉलिसी नहीं ले रहे हैं तो बाकी बातों का ध्यान रखना होगा। जैसे-

– अपने लाइफस्टाइल पर नजर रखें कि आप अपना इलाज किस अस्पताल में कितने बेहतर तरीके के साथ करवा सकते हैं। जरूरी नहीं कि आप कैट्रेक्ट के ऑपरेशन के लिए महंगे एसी सुईट वाले कमरे व विदेशी लेंस लें। अगर आप लग्जरी का ऑप्शन चुनते हैं तो सर्जरी का खर्च बढ़ जाता है।
– 4 लाख का कवर कम से कम 95 फीसदी बीमारियों को कवर करता है। ज्यादा पाने के चक्कर में 100 फीसदी का पीछा करना ठीक नहीं। क्योंकि दोनों के प्रीमियम में काफी फर्क होता है।

– नो क्लेम बोनस का ऑप्शन उपयोग में लें। ऐसी पॉलिसी चुनें जिसमें क्लेम नहीं किए जाने पर वह आपकी रकम अश्योर्ड में जुड़ जाए। वहां आपको प्री एग्जिस्टिंग वेटिंग पीरियड भी नहीं मिलता।

ऐज बैंड की गणित
इरडा सालाना 8 से 10 फीसदी की दर से बढ़ रही मेडिकल खर्च और ऐज बैंड के हिसाब से कंपनियों को प्रीमियम बढ़ाने की अनुमति देता है। चूंकि जब कंपनी अपने प्रॉडक्ट्स फाइल करती है, तब वह मेडिकल इन्फ्लेशन और कस्टमर की उम्र के अनुसार प्रीमियम कोट करती है। कुछ वक्त बाद जब उसके कस्टमर्स की आयु और उसके साथ महंगाई को देखते हुए इलाज के खर्च बढ़ते हैं तो इंश्योरर इन कारणों के साथ अपना शेड्यूल पब्लिश कर कस्टमर्स को बताता है कि वह किस ऐज बैंड के लिए कितना प्रीमियम बढ़ाएगा।

उदाहरण के लिए अगर कोई कंपनी पॉलिसी रिवाइज करते वक्त नए प्रीमियम रेट लागू करती है, तो उस वक्त पॉलिसी लेने वाले 30 साल के व्यक्ति का प्रीमियम 20 फीसदी बढ़ जाएगा, 40 साल वाले का 25-30 पर्सेंट व 55 साल व उससे ज्यादा वाले का यह 35 पर्सेंट होगा। इस पूरे गणित के लिए कंपनियां डेटा इकट्ठा करती हैं और देखती हैं कि किस आयु सीमा में कितना प्रीमियम जा रहा है।

जब कंपनियों को लगता है कि 45-52 की आयु वाला वर्ग जरूरत होने के बाद पॉलिसी ले रहे हैं तो वह प्रीमियम बढ़ाते हैं, क्योंकि उनका क्लेम रेशो नेगेटिव होने लगता है। मतलब उन्होंने लोगों से 100 रुपए लिए और 140 खर्च किए तो वे इसी रेशो के हिसाब से प्रीमियम बढ़ाते हैं। 5 लाख के कवर के लिए 45 साल वाले को अगर 20.4 पर्सेंट ज्यादा देना होगा तो 35 साल वाले के लिए यह 18.78 होगा।

टिप्स

– फैमिली फ्लोटर पॉलिसी का चुनाव बेहतर होगा क्योंकि इसमें पूरे परिवार कवर मिलता है और इसका प्रीमियम भी कम होता है, क्योंकि यह डिवाइड हो जाता है। जबकि पर्सनल हेल्थ इंश्योरेंस में आपको इंडीविजुअल बेसिस पर ही पे करना होता है और यह 2 साल के वेटिंग पीरियड के साथ आती है।
– फैमिली फ्लोटर में परिवार के सबसे उम्रदराज शख्स के हिसाब से ही प्रीमियम की रकम तय होती है। ऐसे बड़ा परिवार होने पर अलग-अलग फ्लोटर पॉलिसी लेने में औसत प्रीमियम में बचत हो सकती है।
– ऐसी पॉलिसी चुनें जो हाई टॉप अप या डिडेक्टेबल बेसिस वाली हो। इसके तहत आपको मेडिकल खर्च की कुछ राशि पहले खुद चुकानी पड़ती है, लेकिन यह वापस मिल जाती है और ऐसी पॉलिसी का प्रीमियम भी कम होता है। अगर ग्रुप पॉलिसी में को-पैमेंट मेथड का उपयोग किया जाए तो बेहतर है।
– सही ऐज बैंड में रहते ही पॉलिसी लेने में ही समझदारी है।
HDFC ERGO के हेड ऑफ मार्केटिंग एंड स्ट्रेटिजी मुकेश कुमार कहते हैं, ‘कोई भी कंपनी अपनी मर्जी से प्रीमियम नहीं बढ़ा सकती। उसे इरडा की गाइडलाइन के अनुसार अपने कस्टमर का शेड्यूल पब्लिश करना होता है कि वह लोगों की उम्र बढ़ने के साथ अपने प्रीमियम में कितनी बढ़ोतरी करेगी और वह किस बेस पर उसे बढ़ाएंगे। प्रीमियम बढ़ने की मुख्य वजह ऐज बैंड और इन्फ्लेशन होती है। किसी भी पॉलिसी के अंदर या बाहर जाने में इश्योरेंस लेने वाला जो ऑप्शन चुनता है, उससे भी प्रीमियम बढ़ने पर असर पड़ता है।इसे ऐसे समझ सकते हैं कि जब बीमा कंपनी को लगता है कि किसी खास बीमारी के लिए लोग खास तरह का इलाज ही करा रहे हैं और इससे उनका खर्च बढ़ रहा है तो प्रीमियम बढ़ना तय होता है। बेहतर है कि लोग बेसिक ट्रीटमेंट पर ध्यान दें, ऑप्टिमम ट्रीटमेंट प्रीमियम बढ़ता है।’Fill form given below so We can send Information required by you.

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Contribution :- सुधा श्रीमाली

2 thoughts on “हेल्थ इंश्योंरेंस की बारिकियों को संमझे”

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